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  बुत न बनो  सुनो ये जो ओढ़े बैठे हो खामोशी का लिहाफ़ उतार फेंको उसे अच्छा नहीं सन्नाटा भीतर का जुबां की राह निकल जाने दो उसे बाहर   ख़ौलाये बैठे हो जो लावा दिल के भीतर जख्मी कर नासूर बनेगा बुत कर देगा तुम्हें इंसान से।   सुनो इतने पाषाण न बनो मन पर जमाए बैठो हो जो मनो बर्फ उसे संवेदनाओं की आँच पर पिघला लो तो जी जाओगे कुछ रोज   दिल दिमाग में ले बैठे हो जो खलिश का कुंहासा कुछ बोलकर निकाल दो बाहर   इंसान हैं हम उबलते , ख़ौलते , बोलते ही बीतेगी जिंदगी इनसे जुदा होकर तो बुत ही हो सकते हैं हम।  -------------००० ------------ डा. लता अग्रवाल 'तुलजा'